8 गांव, 500 से ज्यादा परिवार, डेढ़ से दो हजार रुपए में बच्चे गिरवी रखते हैं

Updated on June 12, 2019 Crime
8 गांव, 500 से ज्यादा परिवार, डेढ़ से दो हजार रुपए में बच्चे गिरवी रखते हैं  , Banswara "पिछले दो माह में बांसवाड़ा-प्रतापगढ़ के 5 बच्चे गडरियों के चुंगल से भागे, माता-पिता ने महज डेढ़ से दो हजार रुपए के लिए उन्हें गडरियों के पास गिरवी रख दिया"

भास्कर पड़ताल  

दीपेश मेहता | चिराग द्विवेदी 

यहां बच्चे गिरवी हैं  प्रदेश का पहला मामला  
 

पिछले दो माह में बांसवाड़ा-प्रतापगढ़ के 5 बच्चे गडरियों के चुंगल से भागे, माता-पिता ने महज डेढ़ से दो हजार रुपए के लिए उन्हें गडरियों के पास गिरवी रख दिया था... घटना के बाद भास्कर के दो रिपोर्टरों ने 7 दिन तक बांसवाड़ा-प्रतापगढ़ जिलों की सीमा पर सटे 8 गांवों में पहुंचकर सच जाना। यहां गरीबी का भयावह चेहरा दिखा। पांच बच्चों के परिवार को तलाशने गए थे, यहां पता चला कि इन गांवों में 500 से ज्यादा परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने सिर्फ घर का गुजारा चलाने के लिए अपने बच्चों का बचपन गिरवी रख दिया...  


बांसवाड़ा. गडरियाें के पास बच्चाें काे गिरवी रखने के एक नहीं पूरे 14 मामले। वे भी वाे जाे चाइल्ड लाइन के रिकॉर्ड में सामने अा पाए है। अाखिर मां-बाप अपने बच्चाें काे गडरियाें के पास कैसे गिरवी रख सकते हैं? यह काैंदता सवाल हमें उन गांवाें तक ले गया, जहां शायद किसी की मजबूरी न हाे ताे कभी न जाए। जब भास्कर टीम इन गांवों में पहुंची तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए, यहां 500 से ज्यादा ऐसे परिवार हैं, जिन्होंने सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिए अपने बच्चों को एक न एक बार गिरवी रखा है। अभी भी करीब 22 बच्चे गिरवी हैं। लेकिन न तो उनके परिजन उनके नाम बताने को तैयार हैं न ही ग्रामीण। उन्हें डर है कि अगर उनके बच्चे वापस आ गए तो उन्हें एक वक्त का खाना भी नसीब नहीं होगा। क्योंकि बांसवाड़ा-प्रतापगढ़ की सीमा पर सटे इन अादिवासी गांवाें में दूर-दूर तक सिर्फ पथरीले पहाड़ ही नजर अाते हैं। बांसवाड़ा के चुंडई, बोरतलाब और मैमखोर, प्रतापगढ़ जिले के भैंठेसला, बावड़ीखेड़ा, कटारों का खेड़ा, लिम्बोदी, अंबाघाटी गांवों में ऐसे ही हालात हैं। मनरेगा, भामाशाह जैसी तमाम सरकारी याेजनाएं यहां कभी पहुंची ही नहीं। अाज भी ये लाेग सामान्य जरूरताें के भी माेहताज हैं। एक वक्त की राेटी पाने के लिए भी इन्हें अपना बहुत कुछ खाेना पड़ता है, यहां तक की अपने बच्चाें काे भी गिरवी रखना पड़ रहा है। बारिश के दिनाें में खेती हाेती है, बाकि 8 माह गरीबी का कुचक्र चलता है। इन गांवों की पूरी लाइव रिपोर्ट...  


चुंडई और बोरतलाब गांव से लाइव रिपोर्ट...  

10 से 14 साल का एक भी लड़का चुंडई गांव में नहीं  
घर में खाने काे कुछ नहीं था, पिता ने कहा-दिनेश काे भेज देते है, 2 हजार मिलेंगे, मां ने भी हामी भर दी  
बांसवाड़ा शहर से 59 किलोमीटर दूर खमेरा के पास है चुंडई गांव। यहां के दो लड़कों काे गड़रिए को गिरवी रखने का मामला सामने अाया है। मुख्य सड़क से 7 किमी अंदर इस गांव में सूखा पड़ा हुअा है। पानी के लिए एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ के हैंडपंप पर जाना पड़ता है। गांव के कई परिवाराें के पास अभी तक बिजली नहीं पहुंची है। हम अज्जू के परिवार के पास पहुंचे। गांव से 3 किमी अंदर पहाड़ी के बीच में एक कच्चा मकान। अज्जू महज 12 वर्ष का है। आर्थिक स्थिति सही नहीं थी। अज्जू के अलावा उसके घर में उसकी चार बहनें वहीया, दीपिका, पूजा और साइना है। इन सबका गुजारा चलाने के लिए उनके पास एक मात्र साधन है 2 बीघा खेत। जिसमें सिर्फ बारिश में ही फसल होती है। क्योंकि इसके अलावा वहां पर पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। अज्जू के पिता मोहन शराब के अादी है। एक दिन घर में खाने काे लेकर अज्जू की मां इंद्रा और मोहन के बीच में झगड़ा हुआ अाैर वह अपने पीहर चली गई। उधर माेहन गांव के ही एजेंट के पास गया और अज्जू को गिरवी रख दिया। यह बात सिर्फ डेढ़ हजार रुपए प्रतिमाह के लिए हुई। यहीं हमें दिनेश मिला। दाे साल तक गडरिए के पास काम करके वह पिछले माह ही भागकर लाैटा है। उसकी भी उम्र महज 12 साल है। उसके पिता लाला ने उसे 2 हजार रुपए के लिए गिरवी रख दिया। इसमें मां लीला की भी सहमति थी। घर में खाने काे कुछ था नहीं। पिता लाला ने लीला से कहा कि दिनेश काे भेज देते हैं। दाे हजार में उनके परिवार काे कुछ दिन गुजारा चलेगा अाैर दिनेश काे ताे राेटी गडरिए से मिल जाएगी। मजबूरी में मां ने भी हामी भर ली। इसी गांव के हम उम्र कालू ने एक साल तक गडरिये पास रहकर काम किया। लेकिन गडरिये ने पैसे नहीं दिए। कालू के पिता शंभु पिछले पांच सालों से खाड़ी देश में मजदूरी कर रहे हैं। वह यहां मां के पास रहता है। 


दो बार गिरवी रखा कल्पेश बोला-अब मुझे अपने घर भी नहीं जाना  
बाेरतलाब गांव। शहर से सिर्फ 15 किमी ही दूर है। इस गांव में ज्यादातर लोग मटके बनाने का काम करते हैं। यहां पर गांव में एक पहाड़ी के पीछे थोरी समाज की अलग से बस्ती बनी हैं। करीब 50 परिवार है। इनमें से एक परिवार है 8 साल के कल्पेश पुत्र विमल थोरी का। विमल सबसे बड़ा है, इसके बाद उसका एक भाई और दो बहनें हैं। कल्पेश का कहना है कि उसके पिता का मौत तीन साल पहले हो गई। कल्पेश के घर में खाने-पीने की समस्या है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे कल्पेश के परिवार में सबसे बड़ा वही है। ऐसे में पैसों की खातिर उसके चाचा ने गडरिये के पास गिरवी रख दिया। इसी गांव में इसी समाज के दो युवाओं को भी पहले गडरिये के पास गिरवी रखा गया था। कल्पेश हाल ही में इंदाैर में गडरिए के चुंगल से भागकर बच निकला। अब उसने घर जाने के लिए साफ इनकार कर दिया है। कल्पेश ने बताया कि उसके पिता की मौत के बाद उसके काका ने रुपए के लिए गिरवी रखा था। वापस घर लौटा तो उसकी मां का एक्सीडेंट हो गया और उसका हाथ टूट गया। ऐसे में फिर से गिरवी रख दिया। मां ने भी कहा कि रुपए की जरूरत है तो तू वहां रह लेना। इसके बाद उसे फिर से गडरियों के पास भेज दिया गया।  


14 बच्चे गडरियों के कब्जे में थे, ये आठ जो भागकर लौटे  


यहीं से क्यों ले जाते हैं बच्चे  
मारवाड़ से अाते हैं गडरिए, अादिवासी क्षेत्र में गरीबी, सस्ते मिल जाते हैं बच्चे  
पाली, सिराेही, जैसलमेर, जाेधपुर अादि क्षेत्राें से गडरिये अाते हैं। जिनके पास करीब 1200 से 1500 भेड़े, ऊंट, कुत्ता, टेंट, पलंग, अपनी रसाेई का सामान अादि सभी साधन हाेते हैं। इसमें हर एक झुंड अपने बीच में दूरी बनाए रखता है। ये लाेग गर्मियाें में रास्ते में अाने वाले बांसवाड़ा-प्रतापगढ़ के एेसे गांवाें के लाेगाें से संपर्क करते हैं, जाे ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हाे। जहां पर मूलभूत सुविधाएं नहीं हाे। ताकि अभाव भरी जिंदगी से तंग अाकर वाे इनके झांसे में अा जाते हैं अाैर उनके साथ चले जाते हैं। एक बार वह निकल ताे जाते हैं, लेकिन उन्हें वापस अाने का रास्ता पता नहीं हाेता है। गडरिये सिर्फ 8 से 14 साल के बच्चों को ही अपने साथ ले जाते हैं। क्योंकि कम उम्र के बच्चे डरते हैं, खाना कम खाते हैं और काम ज्यादा करते हैं। वे इन्हें दो से तीन साल तक ही अपने साथ रखते हैं। बांसवाड़ा या प्रतापगढ़ जिले के अंदरुनी गांव में इनके एजेंट निर्धारित रहते हैं। यह यहां से बच्चे गिरवी ले जाने के लिए सिर्फ उनसे ही बात करते हैं। वागड़ में काेई भी भेड़ नहीं पालता है, लेकिन इन दिनाें यहां पर माही बैकवाटर में अापकाे 1200 से 1500 भेड़ाें के झुंड अासानी से देखने काे मिल जाएंगे। 4 से 5 हजार रुपए प्रतिमाह के ठेके पर यह भेड़ चराने निकल पड़ते है।  
 

जिला प्रशासन कर सकता है कार्रवाई पर करता नहीं  
नाबालिग बच्चाें काे इस तरह से गिरवी रखकर मजदूरी कराने के मामले में अभी तक एक भी कार्रवाई नहीं हुई है। जबकि ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं। बांसवाड़ा में अब तक चुंडई और बोरतलाब गांव के मामले सामने आ चुके हैं। लेकिन गड़रिए के खिलाफ काेई कार्रवाई नहीं की गई। जबकि इस तरह से नाबालिग बच्चाें से मजदूरी कराने वालाें के खिलाफ चाइल्ड लाइन, मानव तस्करी यूनिट, बाल कल्याण समिति और जिला प्रशासन खुद संज्ञान लेकर कार्रवाई कर सकता है।  
 

गांवों में पनपे दलाल  
चौखलाल बोला- मां-बाप खुद आते हैं, मैं तो बस गडरियों से मिला देता हूं  
हम चुंडई गांव में गिरवी रखे बच्चे अज्जू के घर पहुंचे तो वहां आसपास घरों से भी लोग जमा हो गए। ग्रामीणाें ने बताया कि गांव में चौखलाल नाम का एक एजेंट है जो गड़रिए के संपर्क में रहकर सीधे परिजनों से साैदेबाजी कराता है। अज्जू को भी उसके पिता चौखलाल के बताए गड़रिए के पास ही छोड़ आए थे। हम चाैखलाल के पास पहुंचे तो एक बार तो वह सहम गया। शुरुआत में तो बच्चों को गड़रिए के पास छोड़ने की बात पूछने पर वह इनकार करता रहा कि मैं तो ऐसे काम नहीं करता। लेकिन बाद में जब एक के बाद एक उसके द्वारा भेजे गए बच्चों के नाम लिए तो बाद में कबूल किया कि जब घर वाले कोई भेजना चाहते हैं और गडरिए को किसी काम के लिए बच्चों की जरूरत होती है तो वह बताता है। इसका पैसा नहीं लेता है। दूसरे गांवों में इसी तरह से एजेंट सक्रिय हैं, जो इन गडरिये के संपर्क में है।  
 

... और ये बच्चे 5 साल बाद भी नहीं लौटे घर  
केलामेला ग्राम पंचायत के भैंठेसला गांव के तीन बच्चे खेमा सारेल (13 साल), देवीलाल (12 साल) और सुनिल, जो पांच साल पहले गडरिये के पास गिरवी रखे गए। इसकी सूचना चाइल्ड लाइन को 25 अप्रैल 2014 को मिली, लेकिन इन्हें अभी तक वह छुड़ा नहीं पाए हैं। यहां तक कि उनके परिजनों ने कोई गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज नहीं कराई है।  



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