Amba Mata Temple

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अम्बामाता मन्दिर बांसवाडा नगर के प्राचीनतम एवं प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है. राजपुताना के विभिन्न रियासतों के लेखक डॉ. गौरीशंकर उपाध्याय के सहयोगी एवं बांसवाडा रियासतों के इतिहास के जानकर पण्डित करुणा शंकर जी शास्त्री के मतानुसार यह स्थल पोराणिक एवं सिद्ध पीठ है. जानकारों के अनुसार तक़रीबन 300 वर्ष पुराना है. 


यह बांसवाडा महल के परकोटे के बाहर आता था, यह स्थान जंगलनुमा हुवा करता था, जिस कारण यह प्राचीन वृक्षों घिरा हुवा था. जिस कारण यहाँ पर जंगली जानवरों के होने से यहाँ पर आने के लिए लोगों के मन में भय हुवा करता था. उस समय से यहाँ पर एक प्राचीन कुवां है जिसमे जाने के लिए इसके समीप बड़ी बड़ी सीडियाँ है, जिसे ढक दिया गया है. इस परिसर का पानी का स्त्रोत यहीं कुवां है, व गंगा जल उद्यापन के लिए इस कुवें के जल का पूजा में उपयोग किया जाता है.


मन्दिर में मूर्ति प्रतिष्ठित नहीं की गई है, वरन पीठ स्थल की पूजा - अर्चना, श्रृंगार आदि होता है. पीठ स्थल पर पूजन के दौरान चढ़ाये जाने वाले सिंदूर पानियों से पीठ स्थल पर उभरी हुई आकृति बनती गई. कालांतर में इसी उभरी आकृति पर रजत धातु से निर्मित मुखाकृति का स्वरुप दिया गया तथा दौनों भुजाओं में आयुध (शस्त्रों) आदि से श्रृंगार होने लगा. इस पीठ स्थल को सिंह वाहिनी स्वरुप में पूजा जाता है. 1982 में फाल्गुन शुक्ल 5 रविवार संवत 2038 में अम्बिकेश्वर महादेव मंदिर बना.


इस स्थल के समस्त व्यवस्था भक्त जानो एवं श्रद्धालु द्वारा अपने स्थर पर की जा रही है. वर्ष 1948 की अषाढ़ पूर्णिमा को मन्दिर की सेवा पूजा पाठ गरबा आरती अखण्ड ज्योत एवं एक चण्डी पाठ आदि को चीर स्थाई बनाये रखने के उद्देश्य से “अम्बिका माई मंडल” की स्थापना की गई, जिनके संस्थापक सदस्य श्री मनोहर लाल जी नागर, श्री मदन मोहन जी त्रिवेदी, देवीशंकर जी, दुर्गा शंकर जी एडवोकेट, धनशंकर जी झा, पदमनाथ जी पुरोहित, बसंती लाल जी शाह एवं राधेलाल गुप्ता जी थे. 

वर्ष 1967 में मन्दिर का विधिवत ट्रस्ट निर्मित हुवा. वर्तमान में अम्बामाता मन्दिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री प्रकाश चन्द्र दवे (एडवोकेट) है.


प्रमुख धार्मिक आयोजन

चारों नवरात्री पर अखण्ड ज्योत, घाट स्थापना दुर्गा पाठ हवन आदि होते है.

वर्ष में एक बार 24 घंटा अखण्ड गरबा

वर्ष में जपात्मक शतचंडी

अम्बाचौदस पर विशेष पूजा तथा मन्दिर की सजावट की जाती है. 

अम्बिकेश्वर महादेव प्रतिष्ठा उत्सव

बांसवाडा जिले में सर्वप्रथम गरबा नृत्य की शुरुआत इसी मन्दिर से हुई, जिसमे श्री तुलसी लाल जी झा एवं डॉ. शंकर लाल जी त्रिवेदी की प्रमुख भूमिका रही है. 


नवरात्री 

महाशक्ति के नौं रूपों के आराधना का पर्व है नवरात्री। तीन देवियाँ (पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती) के नौं विभिन्न स्वरूपों की उपासना है,  जिन्हें नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है. देवी दुर्गा के नौ स्वरुप हैं शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंधमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री हैं दुर्ग के समान अपने भक्तों की रक्षा करती है अथवा जो अपने भक्तों को दुर्गति से बचाती है, वह आद्याशक्ति ‘दुर्गा’ कहलाती है।’

शास्त्रों के अनुसार ‘साधना’ आध्यात्मिक ऊर्जा और दैवी चेतना को जागृत करने का मार्ग माना जाता है। यह साधना नित्य एवं नैमित्तिक भेद से दो प्रकार की होती है। जो साधना जीवनभर एवं निरंतर की जाती है, वह नित्य साधना कहलाती है। ऐसी साधना साधक का ‘धर्म’ है। किन्तु संसार एवं घर गृहस्थी के चक्रव्यूह में फंसे आम लोगों के पास न तो इतना समय होता है और नहीं इतना सामथ्र्य कि वे नित्य साधना कर सकें। अत: सद्गृहस्थों के जीवन में आने वाले कष्टों/दु:खों की निवृत्ति के लिए हमारे ऋषियों ने नैमित्तिक साधना का प्रतिपादन किया है। नैमित्तिक-साधना के इस महापर्व को ‘नवरात्र’ कहते हैं।


Amba Mata Temple
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