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अरुण जेटली अब नहीं रहे

24 Aug 2019 12:49 pm

नरेंद्र मोदी सरकार में वित्त मंत्री रहे वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण जेटली का शनिवार को निधन हो गया. वो 66 साल के थे. 

बीते नौ अगस्त से अरुण जेटली एम्स में इलाज करा रहे थे. एम्स की प्रवक्ता आरती विज ने मीडिया के लिए जारी प्रेस रिलीज में बताया है कि जेटली ने शनिवार को दोपहर 12 बजकर सात मिनट में अंतिम सांस ली. 

पिछले सप्ताह शनिवार शाम को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जेटली का हालचाल जानने एम्स पहुंचे थे. इससे पहले 9 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन उन्हें देखने के लिए अस्पताल पहुंचे थे. 

इसी महीने सांस लेने में समस्या के चलते अरुण जेटली को नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती किया गय था. उन्हें आईसीयू में रखा गया था. 

इस साल मई में जेटली ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर कहा था कि स्वास्थ्य कारणों से वो नई सरकार में कोई ज़िम्मेदारी नहीं चाहते हैं. उन्होंने लिखा था कि बीते 18 महीनों से उन्हें स्वास्थ्य समस्याएं हैं जिसके कारण वह कोई पद नहीं लेना चाहते हैं. 

वकालत से राजनीति में आए अरुण जेटली बीजेपी के दिग्गज नेताओं में शुमार रहे. 

अरुण जेटली दिल्ली एवं ज़िला क्रिकेट संघ डीडीसीए के अध्यक्ष भी रहे. 

राजनीति में प्रवेश 
दिसंबर 1952 में राजधानी में जन्मे अरुण जेटली ने दिल्ली विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ाई पूरी की. पढ़ाई के बाद उन्होंने सबसे पहले वकालत का काम शुरु किया और जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकीलों की सूची में शामिल हो गए. 

श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स( एसआरसीसी) से स्नातक की पढ़ाई करने के दौरान जेटली 1974 में छात्र संघ के अध्यक्ष भी रहे. इस दौर में कांग्रेस काफी मज़बूत स्थिति में थी. अरुण जेटली ने एबीवीपी (अखिल भारतय विद्यार्थी परिषद) के उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की और माना जाता है कि एक तरह से है उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत यहीं से हो गई थी. 

1973-74 के दौर में जय प्रकाश नारायण (जिन्हें लोग जेपी के नाम से जानते हैं) ने भ्रष्टाचार के विरोध में बड़ा अभियान चलाया. जेपी को अपना राजनीतिक गुरू मानने वाले अरुण जेटली ने इसमें बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. 

1975 में आपातकाल की घोषणा हुई तो अरुण जेटली को भी हिरासत में ले लिया गया. 22 महीने के आपातकाल में जेटली को 19 महीने दिल्ली की तिहाड़ जेल में रखा गया. 

1977 में चुनाव हुए तो कांग्रेस को बुरी हार मिली. जनता पार्टी को सत्ता में आने का मौक़ा मिला और अरुण जेटली लोकतांत्रिक युवा मोर्चा के संयोजक रहे. 

इसी साल उन्हें एबीवीपी का दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और फिर इसके बाद वो जनता पार्टी के लिए अभियान चलाने वाले युवा मोर्चा के अध्यक्ष चुने गए. 

इसके बाद 1980 में जेटली बीजेपी में शामिल हो गए. 1991 के बाद से वो भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने. 

अपने पूरे राजनीतिक सफर में जेटली भारत सरकार में वित्त मंत्री रहे, कुछ वक्त के लिए रक्षा मंत्री रहे, साथ ही सूचना और प्रसार मंत्री भी रहे. 

जब वाजपेयी ने कहा युवा टैलेंट 
1984 में हुए आम चुनावों में भाजपा को शिकस्त मिली. वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिया नायर 'द कारवां बुक ऑफ़ प्रोफ़ाइल्स' में लिखती हैं कि इसके बाद एक बार अटल बिहारी वाजपेयी ने जेटली को युवा टैलेंट कहा. 

इंडिया टुडे को दिए एक साक्षात्कार में वाजपेयी ने कहा था, "हार के बाद हमें फिर से एक बार सोच विचार करने का मौक़ा मिला है. पार्टी को नए चेहरों की ज़रूरत है और हमारे पास बंबई में प्रमोद महाजन और दिल्ली में अरुण जेटली जैसे दो यंग टैंलेंट हैं." 

वो लिखती हैं कि 1990 में भाजपा के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या के लिए रथ यात्रा शुरु की. "उस वक्त अरुण जेटली ही उनके लिए रोज़ की प्रेस ब्रीफ़िंग तैयार करते थे." 

याद रखे जाएंगे नोटबंदी के लिए 
8 नवंबर 2016 की रात को भारत सरकार ने 500 और 1000 रुपये को सभी नोटों का चलन बंद कर दिया. 

प्रधानमंत्री का दावा था कि इससे काले धन पर रोक लगेगी चरमपंथ के वित्तपोषण को रोकने में मदद मिलेगी और साथ ही डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा. 

लेकिन जल्द ही इस कारण आर्थिक विकास की गति धीमी होने के आरोप लगने शुरु हुए. 

इस पर अरुण जेटली ने कहा कि नोटबंदी से टेक्सपेयर के बेस में इज़ाफ़ हुआ है और लोगों को समझ आया है कि डिजिटल भुगतान बेहतर विकल्प है. 

उनके वित्त मंत्री रहते ही जीएसटी को भी लागू किया गया था. 

बोफोर्स सौदे में आरोपों की जांच 
1989 में वो देश के एडिशनल सोलिसिटर जनरल भी रहे. इस दौरान उन्होंने बोफोर्स हथियार सौदे में आरोपों की जांच में जुटे. 

अपनी किताब 'अंधेरे से उजाले की ओर' में अरुण जेटली लिखते हैं कि "वीपी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी की दो ग़ैर-कांग्रेसी सरकारों को छोड़ दिया जाए तो राजनीतिक कार्यपालिका की भूमिका लगातार सच को सामने आने से रोकने की रही." 

बाद में 2012 में राज्यसभा में बोफोर्स मुद्दे पर गर्मागर्म बहस हुई. उस वक्त सदन में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कहा था कि इस मामले में 25 साल बाद भी सच्चाई का सामने नहीं आना पूरे देश के लिए चिंता की बात है.

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