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24-08-2018 to 21-09-2018

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बाबा महाकाल की शाही सवारी, सज्जनगढ़
07-09-2018

हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी सज्जनगढ़ में बाबा महाकाल की तृतीय विशाल शाही सवारी निकाली जायेगी।

विशाल शाही सवारी दिनांक 7 सितम्बर 2018 वार शुक्रवार को दोपहर 12 बजे से निकाली जाएगी।
शाही सवारी तांबेसरा रोड होली वाली स्कूल से प्रारम्भ होकर शाही ठाट बाट से नगर भ्रमण करते हुवे नीलकण्ठ पंचमुखी महादेव मंदिर पहुचेगी।

शाही सवारी के मुख्य आकर्षक
घुड़ सवार दल,
गजराज,
उट सवारी,
गगन भेदी कड़ा बिन तोप(महाकाल ग्रुप उज्जैन द्ववारा)
चल हवन कुंड, 
ड्रोन केमेरे से रिकार्डिंग(भव्या स्टूडियो भूंगड़ा द्ववारा)
नागावाडा DJ साउंड,
झंकार बेंड बागीदौरा,
सर्वसमाज जन द्ववारा शाही सवारी का स्वागत,
पुष्प वर्षा द्ववारा शाही सवारी का स्वागत,
सब्जियों द्ववारा विभिन्न कला कृति(मनोज बेलिया इंदौर वाले के द्ववारा)
आदिवासी लोक गैर नृत्य,
नासिक ढोल पार्टी(झालोद)
प्रसिद्ध लोकगायक कलाकार शशांक तिवारी(झाबुआ)
विभिन्न सांस्कृतिक झांकिया,
बाबा बर्फानी,
महाआरती, 
महाप्रसादी।।

भव्य शाही सवारी के साथ ही मठ मंगेलश्वर महादेव से नीलकण्ठ पंचमुखी महादेव मंदिर सज्जनगढ़ तक भव्य कावड़ यात्रा भी रखी गई है।

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कृष्णा जन्माष्टमी
02-09-2018 to 03-09-2018

भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि के अभिजित मुहूर्त में अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में भगवान कृष्ण ने अवतार लिया। जब जब भी असुरों का जन्म इस धरती पर हुवा और उनके अत्याचार मनुष्य पर हुवें और धर्म का पतन हुआ है तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म को बचाया है. मथुरा नरेश की बहन देवकी जिनके पति वशुदेव के पुत्र कृष्ण जिनका अवतार इस धरती पर कंस की मृत्यु के लिए हुवा था. और फिर महाभारत में गीता का उपदेश दिया और धर्म की स्थापना करने के लिए कृष्ण का जन्म इस धरती पर हुवा था. और कृष्ण ने मनुष्य को प्रेम की परिभाषा भी दी. यह भगवान् विष्णु के वो अवतार है जिसके दर्शन मात्र से प्राणियो संताप, दुःख, पाप मिट जाते है | जिन्होंने इस श्रृष्टि को गीता का उपदेश दे कर उसका कल्याण किया, जो आज मनुष्य की जीने की कला सिखाती है. जिसने अर्जुन को कर्म का सिद्धांत पढाया. तो इस ख़ुशी के दिन को बड़े हर्षो उल्लास के साथ बनाना चाहिए... नाचना, संगीत बजाना ऐसे इस दिन का स्वागत करना चाहिए... जिससे वास्तविक लगे की कृष्ण भगवान आज भी यहीं हमारे सामने ही है. और उनके होने का सम्पूर्ण आभास हमें हो. हमारी तरफ से आप सभी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर बहुत बहुत शुभकामनाये... आप सभी का ये त्यौहार बहुत ही खूबसूरती और हर्षौल्लास के साथ बने... आप इस दिन को अपने परिवार, सम्भंधियों, मित्रों के साथ ख़ुशी ख़ुशी बनाये. हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे.

इस दिन जगह जगह मटकी फोड़ कार्यक्रम होता है, श्रद्धालु गली मोहल्लो चौराहों पर ऊंचाई पर मटकी बढ़ते है और फिर निचे श्रद्धालु एक के ऊपर एक खड़े होकर मटकी तक पहुँचते है फिर मटकी फोड़ते है.

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गणेश चतुर्थी - चतुर्दशी
13-09-2018 to 23-09-2018

गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi)

गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी का त्यौहार देश-विदेश में रहने वाले हिन्दू लोगों द्वारा मनाया जाएगा। यह शुक्ल चतुर्थी (चौथा चंद्र दिवस) पर भाद्रप्रदा के महीने में हर साल पडती है और अनंत चतुर्दशी (चौदहवें चंद्र दिवस) पर समाप्त होती है।

सर्व प्रथम पूजनीय श्री गणेशजी के इस उत्सव को पुरे भारत में बड़े ही धूम धाम से और हर्षो उल्लास के साथ मनाया जाता है. और इसकी शुरुआत महाराष्ट्र से हुई थी. बांसवाडा में भी इस उत्सव को बड़े ही धूम धाम के साथ मनाया जाता है. और सूत्रों के मुताबिक पुरे राजस्थान में सबसे ज्यादा भगवान् गणेशजी की मूर्तिया बांसवाडा शहर में ही होती है. और सबसे भव्य भी यहीं होता है.

गणेश जी की मूर्ति की स्थापना चतुर्थी के दिन शुभ मुहूर्त के समय स्थापित होती है. और फिर 10 दिन तक भगवान् गणेश की पूजा अर्चना होती है. फिर आनंत चतुर्थी को विसर्जन होता है.

गणेश चतुर्थी हिंदुओं का एक सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह हिंदू धर्म के लोगों द्वारा हर साल बहुत साहस, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह भारत में विनायक चतुर्थी के नाम से भी लोकप्रिय है। यह प्राचीन काल से पूरे भारत में हिन्दूओँ के सबसे महत्वपूर्ण देवता, भगवान गणेश जी (जिन्हें हाथी के सिर वाला, विनायक, विघ्नहर्ता, बुद्धि के देवता और प्रारम्भ के देवता आदि के नाम से जाना जाता है) को सम्मानित करने के लिये मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह (अगस्त और सितम्बर के बीच) भाद्रप्रदा के महीने में हर साल आता है। यह शुक्ल चतुर्थी (अर्थात् चाँद वृद्धि अवधि के चौथे दिन) पर शुरू होता है और अनंत चतुर्दशी पर 10 दिन (अर्थात् चाँद वृद्धि अवधि के 14 वें दिन) के बाद समाप्त होता है।

गणेश चतुर्थी का त्यौहार कई रस्में, रीति रिवाज और हिंदू धर्म के लोगों के लिए बहुत महत्व रखता है। विनायक चतुर्थी की तारीख करीब आते ही लोग अत्यधिक उत्सुक हो जाते हैं। आधुनिक समय में, लोग घर के लिए या सार्वजनिक पंडालों को भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्ति लाते है और दस दिनों के लिए पूजा करते हैं। त्यौहार के अंत में लोग मूर्तियों को पानी के बडे स्रोतों (समुद्र, नदी, झील, आदि) में विसर्जित करते हैं।

यह लोगों द्वारा देश के विभिन्न राज्यों जैसे महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और पश्चिमी और दक्षिणी भारत के अन्य भागों सहित बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह 10 दिनों का उत्सव है जो अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होता है। यह कई तराई क्षेत्रों नेपाल, बर्मा, थाईलैंड, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, गुयाना, मारीशस, फिजी, सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, कंबोडिया, न्यूजीलैंड, त्रिनिदाद और टोबैगो आदि में भी मनाया जाता है।

बांसवाडा में गणेश चतुर्थी का इतिहास बांसवाडा

शहर में इस उत्सव की शुरुआत न्यू वागड़ मंडल के द्वारा हुई थी. 1982-83 के मध्य यह मंडल वागड़ क्रिकेट टीम के नाम से प्रख्यात था, जिसमे लगभग 20-22 लोगो का संगठन था. यह संगठन अनंत चौदस पर मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में विसर्जन यात्रा में शामिल होने जाते थे. इस संगठन के मन में विचार आया की क्यूँ न यह उत्सव को हम अपने शहर बांसवाडा में मनाया जाये, और फिर श्री नारायण दास जी महाराज (लालीवाव मठ) के आशीर्वाद से इस उत्सव को करने का निर्णय लिया गया. इस पुरे संगठन में रामभाई सेठिया (अध्यक्ष) नरेशजी सेठिया (उपाध्यक्ष) चंद्रपाल सोनी (कुका भाई सोनी ) (संचालक), श्याम भाई सेठिया, मनोज जी पुरोहित, ओम पंडित, विजय लालजी पंचाल व पूरी सदस्य टीम का सहयोग रहा. अब सबसे महत्वपूर्ण था की मूर्ति किससे बनवाए और फिर क्या था मूर्ति बनाने के लिए मूर्तिकारक की खोज को प्रारंभ किया गया. यह संगठन मध्य प्रदेश के रतलाम शहर की और गया जहाँ इनकी मुलाकात मुर्तिकारक श्री मांगीलाल जी से हुई. जहाँ इन्होने अपना गणेशजी की मूर्ति बनाने का प्रस्ताव रखा जो की 11 फीट का था. और मांगीलालजी ने इस प्रस्ताव को सहज स्वीकार कर लिया और बांसवाडा शहर आ गए. फिर मांगीलालजी ने मूर्ति का निर्माण प्रारंभ किया और फिर कुछ दिनों में उन्होंने 11 फीट की विशाल मूर्ति को बना दिया जिसका वजन 600-700 किलो ग्राम था. जिसकी स्थापना आजाद चौक में करने के लिए 4 अखाड़ो (लालीवाव मठ, मारुती अखाड़ा, खोडिमाल मात अखाड़ा, कलिका माता अखाड़ा) के सदस्यों की सहभागिता थी. और इसी मध्य त्रम्ब्केश्वर मंदिर में भी मुर्तिकारक मांगीलालजी के बारे में ज्ञात हुवा और उन्होंने भी अपने मंदिर पर गणेशजी की मूर्ति की स्थापना करने का निर्णय लिया और उन्होंने भी इसी वर्ष अपने मंदिर के लिए मूर्ति का निर्माण करवाया उस समय अध्यक्ष मुकट जी जोशी थे. फिर लोगो की श्रधा से 10 दिवसों (चतुर्थी से अनन्त चौदस) तक आरती, भजनों के साथ पूजा अर्चना करी. इस उत्सव के समापन पर विसर्जन यात्रा के लिए श्री मनोज भाई पुरोहित जी जिन्होंने मार्ग तय किया और फिर मार्ग आजाद चौक से जामा मस्जिद, पाला, सिद्धि विनायक गणपति नई आबादी, हॉस्पिटल चौराहा, जवाहर पुल, गाँधी मूर्ति, पिपली चौक, महालक्ष्मी चौक, सूरज पोल दरवाजा होते हुवे कागदी जलाशय में विसर्जन करना तय हुवा. और इसी तय मार्ग से ही यात्रा निकली गई. दुसरे वर्ष में इस उत्सव को दुसरे मण्डल का सहयोग मिला और फिर दुसरें मंडलों ने भी मूर्ति स्थापित करना तय हुवा जिसमे दंडेश्वर महादेव, मत्केश्वर महादेव, चन्द्र पोल गेट व महालक्ष्मी चौक व गावं बोदला पंडाल शामिल हुवे. फिर वर्ष दर वर्ष अन्य दुसरे संगठन इसमें जुड़ते रहे और मुर्तिया बढती गई, और आज इस उत्सव ने भव्यता का स्वरुप ले लिया है. और इस प्रकार ये सूत्रों के मुताबिक राजस्थान में बांसवाडा शहर में इस उत्सव को का सबसे ज्यादा भव्यता से मनाया जाता है.

गणेश चतुर्थी महोत्सव की किंवदंतियॉं

गणेश चतुर्थी हिंदुओं का एक पारंपरिक और सांस्कृतिक त्यौहार है। यह भगवान गणेश की पूजा, आदर और सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। भगवान गणेश देवी पार्वती और भगवान शिव के प्यारे बेटे है। गणेश चतुर्थी त्यौहार के महापुरूष भगवान गणेश है। प्राचीन समय में, एक बार भगवान शिव हिमालय के पहाड़ों में अपनी समाधि के लिए चले गये। तब देवी पार्वती अकेली थी और उन्होंने कैलाश पर शिव की अनुपस्थिति में एक बलवान बेटे का निर्माण करने के बारे में सोचा। उन्होंने फैसला किया और भगवान गणेश को चंदन के लेप (स्नान लेने का इस्तेमाल किया गया था) के माध्यम से बनाया और फिर उस मूर्ति में जीवन डाल दिया। उन्होंने उस महान बेटे, गणेश के लिए एक कार्य दिया। उन्होंने गणेश से कहा कि, दरवाजे पर रहो और किसी को भी अन्दर प्रवेश करने की अनुमति नहीं देना तब तक मेरा आदेश न हो। वह यह कह कर बेटे के पहरे में अन्दर नहाने चली गयी।

जल्द ही, भगवान शिव अपनी समाधि से वापस आये और कैलाश पर एक नये लड़के को देखा क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि गणेश उनके ही पुत्र है। शिव अन्दर जाने लगे तो गणेश ने उन्हें अन्दर जाने से रोका। उन्होंने कहा कि माता अन्दर नहा रहीं है और आप अन्दर तभी जा सकते है जब वे मुझे आदेश देंगी। भगवान शिव ने बहुत अनुरोध किया पर उनके बेटे ने उन्हें अनुमति नहीं दी। जल्द ही, सभी देवी देवताओं ने मिल कर गणेश से वैसा ही अनुरोध किया। उन्होंने गणेश को बताया कि भगवान शिव तुम्हारे पिता है, उन्हें अनुमति दे दो क्योंकि इन्हें तुम्हारी माता से मिलने का अधिकार है। किन्तु गणेश ने इंकार कर दिया और कहा मैं अपने पिता का आदर करता हूँ, पर मैं क्या कर सकता हूँ ? मुझे मेरी माता द्वारा कङा आदेश दिया गया कि दरबाजे से अन्दर आने वाले सभी को बाहर ही रोक देना।

भगवान शिव बहुत क्रोधित हो गये, तब सभी देवी देवताओं ने उनसे वहाँ से जाने की प्रार्थना की और कहा की हमें एक और बार प्रयास करने दो। शिव के अनुयायियों (गणों, विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र, नारद, सर्पों, आदि) ने बच्चे को शिष्टाचार सिखाना शुरू किया। इंद्र बहुत क्रोधित हो गया और उसने उस बच्चे पर अपनी पूरी शक्ति से हमला किया हालांकि गणेश बहुत ज्यादा शक्तिशाली थे क्योंकि वे शक्ति के अवतार के रूप में थे। गणेश ने सभी को हरा दिया। भगवान शिव दुबारा आये क्योंकि यह उनके सम्मान का मामला था। वह नाराज हो गये और अपने त्रिशूल से गणेश का सिर काट दिया। जैसे ही माता पार्वती बाहर आयी, वह इस घटना को देखकर बहुत क्रोधित हुई। उन्होंने गणेश के सिर और शरीर को गोद में लेकर रोना शुरु कर दिया। उन्होंने कहा कि मुझे किसी भी कीमत पर अपना बच्चा वापस चाहिये अन्यथा मैं पूरे संसार को नष्ट कर दूँगी।

माता पार्वती के निर्णय से सभी देवी-देवता डर गये। उन्होंने भगवान शिव से कुछ करने की प्रार्थना की। शिव ने कहा कि अब पुनः इसी सिर को जोडना नामुमकिन है किन्तु किसी और के सिर को गणेश के शरीर पर जोडा जा सकता है। उन्होंने अपने अनुयायी गणों को सिर की खोज में भेज दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी ऐसे का सिर लेकर आओं जो उत्तर की दिशा की तरफ मुहँ करके और अपने बच्चे से विपरीत दिशा में सो रहा हो। शिव की बतायी गयी शर्तों के अनुसार गणों ने पूरे संसार में सिर खोजना शुरु कर दिया। अंत में, उन्हें बच्चे के विपरीत उत्तर दिशा में सोते हुये एक हाथी मिला। उन्होंने हाथी का सिर काट लिया और कैलाश पर के आये। भगवान शिव ने गणेश के शरीर पर वह सिर जोड़ दिया। इस तरह से गणेश को वापस अपना जीवन मिला। माता पार्वती ने कहा कि उनका बेटा एक हाथी की तरह लग रहा है, इसलिये सब उसका मजाक बनायेगें, कोई उसका आदर नहीं करेगा। फिर, भगवान शिव, विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र, गणों और आदि सभी देवी देवताओं ने गणेश को आशीर्वाद, शक्तियों, अस्त्र- शस्त्र आदि बहुत से आशीर्वाद दिये। उन्होंने कहा कि कोई भी गणेश का मजाक नहीं बनायेगा इसके साथ ही गणेश सभी के द्वारा किसी भी नये काम को शुरु करने से पहले पूजा जायेगा। गणेश को हर किसी के द्वारा किसी भी पूजा में पहली प्राथमिकता दी जाएगी। जो लोग गणेश को सबसे पहले पूजेंगें वे वास्तव में ज्ञान और धन से धन्य होगें। माता लक्ष्मी ने कहा कि अब से गणेश मेरी गोद में बैठेगें और लोग ज्ञान और धन पाने के लिये मेरे साथ गणेश की पूजा करेगें।

भगवान शिव ने घोषणा कि यह लङका गणेश (गना+ईश अर्थात् गणों के भगवान) कहा जायेगा। इसलिये गणेश सब भगवानों के भगवान है। भगवान गणेश राक्षसों के लिये विघ्नकर्त्ता अर्थात् बाधा-निर्माता और अपने भक्तों और देवताओं के लिये विघ्नहर्त्ता अर्थात् बाधाओं को नष्ट करने वाले और उनकी कङी मेहनत के लिये आशीर्वाद देने वाले है।

 

गणेश चतुर्थी महोत्सव की उत्पत्ति और इतिहास

गणेश चतुर्थी के त्यौहार पर पूजा प्रारंभ होने की सही तारीख किसी को ज्ञात नहीं है, हालांकि इतिहास के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया है कि गणेश चतुर्थी 1630-1680 के दौरान शिवाजी (मराठा साम्राज्य के संस्थापक) के समय में एक सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया जाता था। शिवाजी के समय, यह गणेशोत्सव उनके साम्राज्य के कुलदेवता के रूप में नियमित रूप से मनाना शुरू किया गया था। पेशवाओं के अंत के बाद, यह एक पारिवारिक उत्सव बना रहा, यह 1893 में लोकमान्य तिलक (एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक) द्वारा पुनर्जीवित किया गया।

गणेश चतुर्थी एक बड़ी तैयारी के साथ एक वार्षिक घरेलू त्यौहार के रूप में हिंदू लोगों द्वारा मनाना शुरू किया गया था। सामान्यतः यह ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों के बीच संघर्ष को हटाने के साथ ही लोगों के बीच एकता लाने के लिए एक राष्ट्रीय त्यौहार के रूप में मनाना शुरू किया गया था। महाराष्ट्र में लोगों ने ब्रिटिश शासन के दौरान बहुत साहस और राष्ट्रवादी उत्साह के साथ अंग्रेजों के क्रूर व्यवहार से मुक्त होने के लिये मनाना शुरु किया था। गणेश विसर्जन की रस्म लोकमान्य तिलक द्वारा स्थापित की गयी थी।

धीरे - धीरे लोगों द्वारा यह त्यौहार परिवार के समारोह के बजाय समुदाय की भागीदारी के माध्यम से मनाना शुरू किया गया। समाज और समुदाय के लोग इस त्यौहार को एक साथ सामुदायिक त्यौहार के रुप में मनाने के लिये और बौद्धिक भाषण, कविता, नृत्य, भक्ति गीत, नाटक, संगीत समारोहों, लोक नृत्य करना, आदि क्रियाओं को सामूहिक रुप से करते है। लोग तारीख से पहले एक साथ मिलते हैं और उत्सव मनाने के साथ ही साथ यह भी तय करते है कि इतनी बडी भीड को कैसे नियंत्रित करना है।

गणेश चतुर्थी, एक पवित्र हिन्दू त्यौहार है, लोगों द्वारा भगवान गणेश (भगवानों के भगवान, अर्थात् बुद्धि और समृद्धि के सर्वोच्च भगवान) के जन्म दिन के रूप में मनाया जाता है। पूरा हिंदू समुदाय एक साथ पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ प्रतिवर्ष मनाते है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह माना जाता है कि गणेश जी का जन्म माघ माह में चतुर्थी (उज्ज्वल पखवाड़े के चौथे दिन) हुआ था। तब से, भगवान गणेश के जन्म की तारीख गणेश चतुर्थी के रूप में मनानी शुरू की गयी। आजकल, यह हिंदू समुदाय के लोगों द्वारा पूरी दुनिया में मनाया जाता है।

 

गणेश चतुर्थी कैसे मनाते है

गणेश चतुर्थी उत्सव की तैयारियाँ एक महीने या एक हफ्ते पहले से शुरु हो जाती है। अत्यधिक कुशल कलाकार और कारीगर गणेश चतुर्थी पर पूजा के प्रयोजन के लिए भगवान गणेश की विविध कलात्मक मिट्टी की मूर्तियों का निर्माण करने लगते हैं। पूरा बाजार गणेश की मूर्तियों से भरा होता है। सारा बाजार अपने पूरे जोरो से गति पकडता है। यह देखकर बहुत अच्छा लगता है जैसे बाजार में सब कुछ इस बडे हिन्दू त्यौहार का स्वागत कर रहा हो। प्रतिमाओं को एक असली रूप देने के लिए उन्हें कई रंगों का उपयोग करके सजाया जाता हैं।

 

समुदाय में समारोह

समुदाय के लोग रुपयों के योगदान और संग्रह के द्वारा विशिष्ट क्षेत्र में पंडाल तैयार करते है। समुदाय के लोग पूजा करने के लिए गणेश जी की भव्य प्रतिमा लाते है। वे दूसरों की तुलना में अपने पंडाल को आदर्श बनाने के लिये अपने पंडाल को (फूल, माला, बिजली की रोशनी, आदि का उपयोग कर) सजाते है। वे धार्मिक विषयों के चित्रण विषय पर आधारित सजावट करते हैं। मंदिरों के पुजारी शॉल के साथ लाल या सफेद धोती में तैयार होते है। वे मंत्रो का जाप करते है और प्रार्थना करते है। प्राण प्रतिष्ठा और सदोपचार (अर्थात् श्रद्धांजलि अर्पित करने का तरीका) की धार्मिक क्रिया होती है। भक्त नारियल, मोदक, गुड़, दूब घास, फूल, लाल फूल माला आदि, सहित भगवान के लिए विभिन्न प्रकार की चीजों की भेंट चढाते है। भक्त पूरी प्रतिमा के शरीर के पर कुमकुम और चंदन का लेप लगाते हैं।

एक बड़ा अनुष्ठान समारोह हर साल आयोजित किया जाता है। लोग, मंत्रों का जाप भक्ति गीत, उपनिषद से गणपति अथर्व-सहिंता, वेदऋग्वेद से सस्वर भजन, नारद पुराण से गणेश स्तोत्र और भी कई पाठ पूरे समारोह के दौरान किये जाते है। लोग इस त्यौहार को उनकी मान्यताओं, रीति-रिवाजों और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग अलग तरीकों से मनाते हैं। सभी अनुष्ठानों गणपति स्थापना (अर्थात् मूर्ति स्थापित करना) से लेकर गणपति विसर्जन (अर्थात् मूर्ति का विसर्जन) तक में एक बहुत बडी भीड समारोह का हिस्सा बनने और पूरे वर्ष के लिये बुद्धि और समृद्धि का आशीर्वाद पाने के शामिल होती है।

 

घर पर समारोह

गणेश चतुर्थी पूरे भारत में मनायी जाती है, हालांकि यह महाराष्ट्र में साल के सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार के रुप में मनाया जाता है। बहुत से परिवार इस त्यौहार को छोटे स्तर पर सभी रस्मों को समान ढंग से करके अपने घर में मनाते है। परिवार का एक सदस्य गणेश जी की छोटी या बडी मूर्ति (पसन्द के अनुसार) घर लाकर घर के मन्दिर या घर के बीच या किसी बडे खुले स्थान पर मूर्ति की स्थापना करते है। परिवार के सभी सदस्य विसर्जन तक दोनों समय सुबह जल्दी उठकर और शाम को एक साथ गणेश जी की प्रतिमा की पूजा करते है। लोग प्रार्थना करते है, भक्ति गीत, नृत्य, हरी घास के फूल, फल, घी दीया, मुलायम घास का गुच्छा (दूब, एक 21 सूत या एक ऐसा सूत जिसके 3 या 5 गुच्छें हो), मिठाई, मोदक, धूप-बत्ती, कपूर, आदि अर्पित करते है।

लोग दोनों समय पूजा करते है (मुख्यतः 21 बार), और अपनी पूजा बडी आरती के साथ समाप्त करते है। महाराष्ट्र में लोगों द्वारा विशेष रुप से सन्त रामदास द्वारा 17 वीं शताब्दी में लिखी गयी आरती (पूजा के अन्त में) गायी जाती है। घरेलू समारोह 1, 3, 5, 7 या 11 दिनों के बाद नदी, समुद्र आदि की तरह बड़े पानी के स्रोत में प्रतिमा के विसर्जन पर समाप्त होता है। भारी भीड के कारण उत्पन्न समस्याओं से दूर रहने के लिये, लोग धीरे-धीरे पानी के बडें स्त्रोतो पर विसर्जन के लिये जाने से बचने लगे है। लोग पानी की एक बाल्टी या टब में गणपति विसर्जन करते हैं और बाद में वे बगीचे में इस मिट्टी का उपयोग कर लेते है।

 

महोत्सव के लिए तैयारी

लोग कम से कम एक महीने या एक सप्ताह पहले से इस समारोह की तैयारियाँ शुरू करते हैं। वे भगवान गणेश का सबसे प्रिय व्यंजन मोदक (मराठी में) बनाते है। इसके विभिन्न भाषाओं के कारण अनेक नाम है जैसे: कन्नङ में कडुबु या मोदक , मलयालम में कोज़हाकट्टा और मोदकम, तेलुगु में मोदकम् और कुडुमु और तमिल में कॉज़हक़त्तई और मोदगम। मोदक चावल के आटे या गेहूं के आटे में नारियल, सूखे मेवे, मसालों और गुड़ के मिश्रण का उपयोग कर पूजा के लिए विशेष रूप से तैयार किया जाता है। कुछ लोग इसे भाप के द्वारा और कुछ इसे पकाकर बनाते है। मोदक की तरह एक अन्य पकवान करन्जी कहा जाता है, लेकिन यह आकार (अर्धवृत्ताकार आकार) में भिन्न है। 21 की संख्या में गणेश जी को मोदक की भेंट करने की एक रस्म है।

 

पूजा प्रक्रिया, रस्में और गणेश चतुर्थी का महत्व

पूरे भारत में पूजा प्रक्रिया और अनुष्ठान क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार थोड़े अलग है।लोग गणेश चतुर्थी की तारीख से 2-3 महीने पहले विभिन्न आकारों में भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्ति बनाना शुरू कर देते है। लोग घर में किसी उठे हुये प्लेटफार्म पर या घर के बाहर किसी बडी जगह पर सुसज्जित तम्बू में एक गणेश जी की मूर्ति रख देते है ताकि लोग देखे और पूजा के लिये खडे हो सके। लोगों को अपने स्वयं या किसी भी निकटतम मंदिर के पुजारी को बुलाकर सभी तैयारी करते हैं।

कुछ लोग इन सभी दिनों के दौरान सुबह ब्रह्मा मुहूर्त में ध्यान करते हैं। भक्त नहाकर मंदिर जाते है या घर पर पूजा करते है। वे पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ पूजा करके प्रसाद अर्पित करते है। लोग मानते है कि इस दिन चाँद नहीं देखना चाहिये और भगवान में अविश्वास करने वाले लोगों से दूर रहना चाहिये।

लोग पूजा खासतौर पर लाल सिल्क की धोती और शाल पहनकर करते है। भगवान को मूर्ति में बुलाने के लिये पुजारी मंत्रों का जाप करते है। यह हिन्दू रस्म प्राणप्रतिष्ठा अर्थात् मूर्ति की स्थापना कहलाती है। इस अनुष्ठान का एक अन्य अनुष्ठान द्वारा अनुगमन किया जाता है, जिसे षोष्ढषोपचार अर्थात् गणेश जी को श्रद्धांजलि देने के 16 तरीकें कहा जाता है। लोग नारियल, 21 मोदक, 21 दूव- घास, लाल फूल, मिठाई, गुड़, धूप बत्ती, माला आदि की भेंट करते है। सबसे पहले लोग मूर्ति पर कुमकुम और चंदन का लेप लगाते है और पूजा के सभी दिनों में वैदिक भजन और मंत्रो का जाप, गणपति अथर्व संहिता, गणपति स्त्रोत और भक्ति के गीत गाकर भेंट अर्पित करते है।

गणेश पूजा भाद्रपद शुद्ध चतुर्थी से शुरू होती है और अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होती है। 11 वें दिन गणेश विसर्जन नृत्य और गायन के साथ सड़क पर एक जुलूस के माध्यम से किया जाता है। जलूस,“गणपति बप्पा मोरया, घीमा लड्डू चोरिया, पूदचा वर्षी लाऊकारिया, बप्पा मोरया रे, बप्पा मोरया रे” से शुरु होता है अर्थात् लोग भगवान से अगले साल फिर आने की प्रार्थना करते है। लोग मूर्ति को पानी में विसर्जित करते समय भगवान से पूरे साल उनके अच्छे और समृद्धि के लिये प्रार्थना करते है। भक्त विसर्जन के दौरान फूल, माला, नारियल, कपूर और मिठाई अर्पित करते है।

लोग भगवान को खुश करने के लिये उन्हें मोदक भेंट करते हैं क्योंकि गणेश जी को मोदक बहुत प्रिय है। ये माना जाता है कि इस दिन पूरी भक्ति से प्रार्थना करने से आन्तरिक आध्यात्मिक मजबूती, समृद्धि, बाधाओं का नाश और सभी इच्छाओं की प्राप्ति होती है। ये विश्वास किया जाता है कि, पहले व्यक्ति जिसने गणेश चतुर्थी का उपवास रखा था वे चन्द्र (चन्द्रमा) थे। एकबार, गणेश स्वर्ग की यात्रा कर रहे थे तभी वो चन्द्रमा से मिले। उसे अपनी सुन्दरता पर बहुत घमण्ड था और वो गणेश जी की भिन्न आकृति देख कर हँस पड़ा। तब गणेश जी ने उसे श्राप दे दिया। चन्द्रमा बहुत उदास हो गया और गणेश से उसे माफ करने की प्रार्थना की। अन्त में भगवान गणेश ने उसे श्राप से मुक्त होने के लिये पूरी भक्ति और श्रद्धा के साथ गणेश चतुर्थी का व्रत रखने की सलाह दी।

वायु पुराण के अनुसार, यदि कोई भी भगवान कृष्ण की कथा को सुनकर व्रत रखता है तो वह (स्त्री/पुरुष) गलत आरोप से मुक्त हो सकता है। कुछ लोग इस पानी को शुद्ध करने की धारणा से हर्बल और औषधीय पौधों की पत्तियाँ मूर्ति विसर्जन करते समय पानी में मिलाते है। कुछ लोग इस दिन विशेष रूप से अपने आप को बीमारियों से दूर रखने के लिये झील का पानी का पानी पाते है। लोग शरीर और परिवेश से सभी नकारात्मक ऊर्जा और बुराई की सत्ता हटाने के उद्देश्य से विशेष रूप से गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश के आठ अवतार (अर्थात् अष्टविनायक) की पूजा करते हैं। यह माना जाता है कि गणेश चतुर्थी पर पृथ्वी पर नारियल तोड़ने की क्रिया वातावरण से सभी नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करने में सफलता को सुनिश्चित करता है।

 

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श्राद्ध
26-09-2018 to 09-10-2018

पितृ पक्ष पन्द्रह दिन की समयावधि होती है जिसमें हिन्दू जन अपने पूर्वजों को भोजन अर्पण कर उन्हें श्रधांजलि देते हैं।

हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि जो स्वजन अपने शरीर को छोड़कर चले गए हैं चाहे वे किसी भी रूप में अथवा किसी भी लोक में हों, उनकी तृप्ति और उन्नति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, वह श्राद्ध है। माना जाता है कि सावन की पूर्णिमा से ही पितर मृत्यु लोक में आ जाते हैं और नवांकुरित कुशा की नोकों पर विराजमान हो जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष में हम जो भी पितरों के नाम का निकालते हैं, उसे वे सूक्ष्म रूप में आकर ग्रहण करते हैं। केवल तीन पीढ़ियों का श्राद्ध और पिंड दान करने का ही विधान है।

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हिंदी दिवस
14-09-2018

भारत में सबसे ज्यादा बोली जानें वाली हमारी मातृभाषा हिंदी को राजभाषा का दर्जा 14 सिंतबर के दिन ही मिला था. हमारे देश के लगभग 77% लोग हिंदी लिखते, पढ़ते, बोलते और समझते हैं।


इतिहास

भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को 'हिन्दी दिवस' के रूप में मनाया जाएगा।

कब और क्यों मनाया जाता है

हिन्दी दिवस भारत में हर वर्ष '14 सितंबर' को मनाया जाता है। हिन्दी हिन्दुस्तान की भाषा है। राष्ट्रभाषा किसी भी देश की पहचान और गौरव होती है। हिन्दी हिन्दुस्तान को बांधती है। इसके प्रति अपना प्रेम और सम्मान प्रकट करना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। इसी कर्तव्य हेतु हम 14 सितंबर के दिन को 'हिन्दी दिवस' के रूप में मनाते हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, साक्षर से निरक्षर तक प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति हिन्दी भाषा को आसानी से बोल-समझ लेता है। यही इस भाषा की पहचान भी है कि इसे बोलने और समझने में किसी को कोई परेशानी नहीं होती।

अंग्रेजी बाजार में पिछड़ती हिन्दी

आजकल अंग्रेजी बाजार के चलते दुनियाभर में हिन्दी जानने और बोलने वाले को बाजार में अनपढ़ या एक गंवार के रूप में देखा जाता है या यह कह सकते हैं कि हिन्दी बोलने वालों को लोग तुच्छ नजरिए से देखते हैं। यह कतई सही नहीं है। हम हमारे ही देश में अंग्रेजी के गुलाम बन बैठे हैं और हम ही अपनी हिन्दी भाषा को वह मान-सम्मान नहीं दे पा रहे हैं, जो भारत और देश की भाषा के प्रति हर देशवासियों के नजर में होना चाहिए। हम या आप जब भी किसी बड़े होटल या बिजनेस क्लास के लोगों के बीच खड़े होकर गर्व से अपनी मातृभाषा का प्रयोग कर रहे होते हैं तो उनके दिमाग में आपकी छवि एक गंवार की बनती है। घर पर बच्चा अतिथियों को अंग्रेजी में कविता आदि सुना दे तो माता-पिता गर्व महसूस करने लगते हैं। इन्हीं कारणों से लोग हिन्दी बोलने से घबराते हैं।

 

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जलझुलनी (देवझूलनी) एकादशी
20-09-2018

रामरेवाड़ी (Ram Rewadi)

भारतीय पंचांग के अनुसार प्रति वर्ष हर माह शुक्ल ग्यारस आती है पर भाद्रपद मास में आने वाली शुक्ल ग्यारस को जलझुलनी (देवझूलनी) ग्यारस कहते है.

 

माना जाता है की यह उत्सव आराम कर रहे विष्णु भगवान् को ताजा बरसात के पानी से नहलाने की रस्म पूरी करने से है. भगवान् इस दिन करवट लेते है, इस दिन परिवर्तन चालू होता है, इसलिए इसे परिवर्तन का दिन भी कहाँ जाता है. इसी के साथ एक कारण यह माना जाता है, की भगवान् विष्णु जब चार महीने राजा बलि के वहां पहरेदारी करने जाते है तो राजा बलि उन्हें सम्मान के साथ स्नान कराकर ले जाते है. इस अवसर पर शहर के मन्दिरों और मठों में भगवान का मनोहारी श्रृंगार किया जाता है.

 

इस दिन विष्णु अनुष्ठान, कथाश्रवण व उपवास के साथ ही श्रद्धालु दान-पुण्य करते है. और शहर के विभिन्न मन्दिरों से परम्परागत रामरेवाड़ियाँ जयकारों के साथ निकाली जाती है, जो शहर के मुख्य मार्ग आज़ाद चोक, पिपली चोक, धनलक्ष्मी चोक मार्किट, नगरवाडा, भारवचोक, त्रिपोलिया रोड, तेलियों की पिपली, पृथ्वीगंज फिर राजतालाब की पाल पर एकत्रित होती है राजतालाब क्षेत्र में इस अवसर पर ग्यारस का परंपरागत मेला भरता है, यह तेजाजी का मेला होता है जो की एक दिन पूर्व ही लग जाता है, यहाँ कई दुकाने और झूले लगते है. मेलास्थल पर ग्यारस के उपवास की वजह से फलाहार की कई दुकानें लगती है, जहां व्रती नर-नारियों का जमघट लगा रहता है. मेला स्थल पर भगवान की पूजा-अर्चना और आरती होती है, और भक्तजन पूरी आस्था के साथ भगवान की सेवा करते है. परम्परागत पूजा-अर्चना के बाद सभी रामरेवाड़ियाँ वापस भजन-कीर्तनों की गूंज व सैकडों भक्तों के साथ गोरख इमली, कालिका माता, महालक्ष्मी चोक होते हुवे अपने-अपने धाम पहुँचती है. भगवान की पालकियां मन्दिर पहुंचने के बाद भक्तजन पूरी भक्तिभाव के साथ उनकी अगवानी की और अनुष्ठानों के बाद आरती करते है. इन्ही राम रेवाडियों में शहर के सभी आखाड़े ( लालीवाव अखाडा, वनेश्वर अखाडा, खोड़ीयाल माता अखाडा, पवनपुत्र बाबा बस्ती अखाडा, मारुती अखाडा, पाण्डव व्यायाम शाला व कलिका माता अखाडा). सम्मिलित होते है, इसमें अखाडों के पहलवान अपने-अपने दल और भगवान हनुमानजी की प्रतिमा या तस्वीर के साथ जुलूस के साथ निकलते है. ये अखाडों के दल शहर भर में साहसिक करतबों और शक्ति का प्रदर्शन करते है, और इस प्रकार दाव, पेच दिखाते है और साथ में यह भी बताते है की अपनी आत्मा रक्षा केसे की जा सके. और इस प्रकार अपने साहस का परिचय देते है. इनके इन करतब से शहरवासी को आश्चर्यचकित हो जाते है. इस अवसर पर निकली रामरेवाडयों के दर्शन तथा भगवान की झलक पाने के लिए रास्ते भर श्रद्धालुओं की भीड बनी रहती है. भक्तजन अपनी श्रद्धा के अनुसार फल, फूल, प्रसाद, धार्मिक पुस्तक व अन्य सामग्री, दीप, कलश आदि प्रत्येक रवाडी में भगवान को समर्पित करते है, और श्रद्धा का इजहार करते है. और साथ ही अखाड़ों के द्वारा बताये जाने वाले करतबों को देखने के लिए लोगो की बहुत भीड़ लगती है. इस शोभायात्रा की शुरुआत माना जाता है की बाँसवाड़ा शहर में सन1900 के लगभग समय में राम रेवाड़ियाँ निकलना शुरू हुई. उस समयकाल में यहाँ रजवाड़ों (दरबार) के पास 7 मन्दिर और शहर में 4 मन्दिर थे, और इन्ही मंदिरों के साथ इस शोभा यात्रा की शुरुआत हुई. यह शोभा यात्रा इन 7 मन्दिरों से भगवान् विष्णु की अवतारों की मूर्तियों को पालकी में बिठाकर शहर के विविध मार्गों से निकलकर नदी (इस समय के नए बस-स्टैंड के समीप ) में स्नान, पूजा अर्चना कराकर पुन: भगवान् को मंदिरों में विराजित किया जाता था. अब ये राम रेवाड़ियाँ बढ़कर 40-42 हो चुकी है. समयानुसार मार्ग में बदलाव हुवा और फिर कलेक्टर मोहन सिंह मेहता ने नया मार्ग सुझाया.

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मोहरम
18-09-2018 to 21-09-2018

Muharram - Mohram - मोहरम

मुस्लिम इस्लामी साल का पहला महीना है, इसी महीने की दसवी तारीख को योमे आशूरा कहते है, आम तोर पर इस दिन  को इमामे हुसैन की शहादत के लिए जाना जाता है, पर हकीकत यह है कि इमामे हुसैन की शहादत से हज़ारों साल पहले ही से यह दिन अल्लाह पाक के नज़दीक अहमियत, का हामिल है, दुनियाँ की बड़ी-बड़ी घटनाये वा कियांत इसी रोज रुनुमा हुवे है चाहे वह अम्बियां किराम [पैग़ामबराम] के मोजजात हो, या कायनात की तख़लीफ़ (रचना) से मुतल्लिख हो, लेकिन शहादते हुसैन वह क़यामत खेज घटना है, जिसको कोई ईमान वाला भुला नहीं सकता, ६१ सन हिज़री में सरकार इमामे हुसैन को अपने वतन से दूर भूखा और प्यासा बच्चों और खानदान के शहजादों के साथ न हक़ शहीद किया गया, यह जंग कोई तखत या कुर्सी या असरों रुसुक की नहीं थी याग हक़ और बाहिल  (सत्य और आस्था) की लड़ाई थी, रसूले पाक स.अ.व.स के सहाबी हज़रात आमिर मुआवियह के इन्तिकाल के बाद उनका बीटा यजीद आवाम की मर्जी के बिना जबरदस्ती तखत पर काबिज होकर खलीफा बन बैठा, यजीद चूँकि फ़ासिक़, फजीर् थ. दीने इस्लाम के नियमों व सिद्धांतों का उलंघन करने वाला और शरई कानून का खुले आम धज्जिया उड़ाने वाला था, इस लिए वह खलीफा बननेke लायक नहीं था खलीफा की जिम्मेदारी होती थी की खुद सहीं राह पर चलकर आवाम को सहीं राह पर चलाये, यजीद खुद गुमराह था, इसलिए इम्मामे हुसैन ने उसको खालिफ तस्लीम नहीं किया, यजीद  की अवैध हरकतों की रोक थम के लिए हुसैन का खलीफा न मानना उचित कदम था. क्योंकि इमामे हुसैन का यजीद को खलीफा तस्लीम करना यजीद की अवैध हरकतों की वैधानियत का प्रमाण बन जाता। सरकार इमामे हुसैन को अपने वतन से निकला गया, भूखा प्यासा रखा गया।  उनके नज़रों के सामने, भाइयों, भतीजों, भानजों, बेटों, दोस्तों को शहीद किया गया, लेकिन इमामे हुसैन सब्र (धैर्य) का दामन थामे रहे, अन्यथा जुलम अपराध फिसको फुजुर के खातिये के लिए सरकारे हुसैन ने इस्लाम के अमन-चमन को अपने खून से सेराब किया और जुलम के आगे सब्र करते रहे अपने नाना के दीन(इस्लाम) की रक्षा के लिए हर क़ुरबानी देने में उन्हें फख्र महसूस होता था, आखरी डैम तक हुसैन का यह नारा था की

जो जान मांगोगे तो जान देंगे.
जो मॉल मांगोगे तो मॉल देंगे.
मगर हम से यह हरगिज न होगा की नबी का 
जहॉ जलाल देंगे. 

इमाम हुसैन का पैगाम

इस्लाम अमन का महजब है सब्र की तालीम देता है, हुसैन ने हर हल में सब्र किया और सच्चाई पे कायम रहे. 

इमामे हुसैन शहीद होकर भी मोमिनित के दिलों के शहंशाह और फातिह हो गए और यजीद जंग जीत कर भी हर गाय. क्यूंकि जीत सच्चाई (हक़) की होती है. बुराई के खिलाफ आवाज उठाओं हर मुसीबत कठिनाई पे सब्र करो अमन और शांति के साथ मिलकर एकता के साथ दुश्मनों के जुलम और ज्यादती का मुकाबला करो.

यह शहीदे आजम शहनशाहे करबला का पैगाम है. 

जानकारी 
मौलाना अहमद खा  सिंधी
इमाम सा. जामा मस्जिद बांसवाड़ा 
Mobile 8003480329 

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