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बेणेश्वर मेला
18-02-2019 to 20-02-2019

Mahakumbh at Baneshwar in Vagar, Baneshwar Fair

 

Banswara : संत मावजी महाराज की इस भूमि माही,सोम और जाखम नदी के त्रिवेणी संगम पर बने बेणेश्वरधाम पर वागड़ का महाकुंभ. यह सबसे बड़ा मेला माघ शुक्ल पूर्णिमा पर आयोजित किया जाएगा। मेले में देशी-विदेशी से पर्यटक आयेंगे.

 

इस मेले में बेणेश्वरधाम के महंत अच्युतानंदजी का सानिध्य सभिकों मिलेगा।

 

अखिल विश्व में अपनी अनूठी लोक संस्कृति व गीत संगीत के लिए पहचान स्थापित करने वाली वीर प्रसविनी धरा राजस्थान के दक्षिणांचल में मध्यप्रदेश, गुजरात और राजस्थान की सीमाओं पर स्थित वागड़ क्षेत्र डूंगरपुर, बांसवाड़ा जिला सदैव से अपनी मनमौजी परंपराओं सांस्कृतिक धार्मिक मेलों एंव हाट बाजारों के कारण देश प्रदेश में ख्यात रहा है।

 

इसी वागड़ में आदिम संस्कृति की अगाध आस्थाओं से जुड़ा देश का सबसे बड़ा आदिवासी जमघट वाला विशाल मेला वागड़ प्रयाग या वागड़ वृन्दावन उपनाम से ख्यातनाम तीर्थ बेणेश्वर पर आयोजित होता है जिसमें करीब 5 लाख लोगों की उपस्थिति में आस्थाओं को आकार प्राप्त होता है।

 

जिला मुख्यालय डूंगरपुर से 70 किमी दूरी पर अवस्थित जनजाति तीर्थ बेणेश्वर माही, सोम, जाखम, सलिलाओं, शिव शक्ति और वैष्णव देवालयों और त्रिदेवों के संगम होने से देवलोक का प्रतिरूप सा बन गया है। युगों-युगों से सामाजिक समरसता एवं एकात्मता का मंत्र गुंजाने वाले इस बेणेश्वर धाम पर माघ शुक्ला एकादशी से आदिवासियों का महाकुंभ प्रारंभ होता है जो क्रमशः विकसित होता हुआ माघ पूर्णिमा पर पूर्ण यौवन पर होता है।

 

माघ पूर्णिमा के मेले में वागड़ अंचल के साथ ही आसपास के गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र आदि प्रान्तों के श्रद्धालु भी सम्मिलित होते हैं और विभिन्न अनुष्ठानों में हिस्सा लेकर पुण्य लाभ पाते हैं। इस दौरान तीन राज्यों की जनजाति संस्कृति सम्मिलित होकर थिरकती प्रतीत होती है। तीन राज्यों के वनवासियों की संस्कृति एवं समाज की विभिन्न विकासधाराओं का दिग्दर्शन कराने वाला यह मेला आँचलिक जनजाति संस्कृति का नायाब उदाहरण है।

 

राजा बली की यज्ञ स्थली और नदियों के संगम स्थल कारण पुण्यधरा माने जाने के कारण इस मेले में लोग आबूदर्रा में अपने मृत परिजनों के मोक्ष की कामना से पवित्र स्नान, मुण्डन, तर्पण, अस्थि विसर्जन आदि धार्मिक रस्में पूरी करते हैं। माघ पूर्णिमा के दिन लाखों श्रद्धालुओं द्वारा एक साथ दिवंगत परिजनों की अस्थियों के विसर्जन की रस्म इस स्थान की महत्ता और जनास्थाओं को उजागर करती है।

 

इस मेले में उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों से अलग-अलग सम्प्रदाओं, मतों, पंथों, अखाड़ों, धूणियों एवं आश्रमों-मठों से भाग लेने वाले महन्त, भगत एवं श्रद्धालुओं द्वारा भावविभोर हो प्रवाहित की जाने वाली भक्ति स्वर लहरियाँ वातावरण को आध्यात्मिक सुरभि से महकाती रहती है। संपूर्ण मेलावधि में भजन कीर्तन के स्वर अहर्निश गुंजायमान रहते हैं।

 

परंपरागत भजन गायक अपने वाद्यों तानपूरे, तम्बूरे, कौण्डियों, ढ़ोल, मंजीरे, हारमोनियम आदि की संगत पर जब मेले में समूह भक्ति की तान छेड़ते हैं तो इस बेणेश्वर धाम पर अध्यात्म व श्रद्धा अनोखी ही महक भरी उठती हैं। बेणश्वर धाम के संपूर्ण देवालय विशेषकर राधा-कृष्ण मंदिर परिसर और वाल्मीकि मंदिर भक्ति सरिताओं के प्रवाह केन्द्र रहते हैं। वाल्मीकी मन्दिर पर तो जब एटीवाला पाड़ला के महन्त की पालकी आती है तब भजनों के साथ हवन होता है।

 

राधा-कृष्ण मंदिर परिसर में साद सम्प्रदाय के लोगों का खासा जमावड़ा होता है जो मावजी की भविष्यवाणियों का गान करता है। बेणेश्वर धाम पर आयोजित होने वाले मेले को भक्ति साहित्य के संवहन का भी अनूठा मेला कहा जा सकता है क्योंकि बेणेश्वर की भक्ति धाराओं में न केवल मावजी से संबंधित भजन-कीर्तन अपितु देश, समाज, धर्म, मंदिर, इतिहास पुरूषों, विभिन्न अवतारों कबीर, गोविन्द गुरू, मीरा बाई से लेकर देश के प्रमुख संतों, भक्त कवियों और लोक देवताओं का स्तुतिगान एवं वाणियों का गान होता है। इसके अतिरिक्त मेलावधि में भक्तिभाव से ईतर स्वातंत्रय चेतना का शंखनाद करने वाला यह भजन आज भी मेले पूरी आस्था के साथ आदिमजनों द्वारा गाया जाता है।

ष्ष्झालोदा म्हारी कुण्डी हैए दाहोद म्हारी थालीए नी मानूँ रे भूरेटियाए नी मानूँ रेण्ण्ण् दिल्ली म्हारो डंको हैए बेणेसर म्हारेा सोपड़ो नी मानूँ रे भूरेटियाए नी मानूँण्ण्ष्ष्

मेले के दौरान धाम के महन्त गोस्वामी अच्युतानंद महाराज के अलावा देश-प्रदेश से आने वाले संतों के सानिध्य में धर्मसभाओं का आयोजन भी होता रहता है। इन धर्मसभाओं में धार्मिक चेजना जागृत करने के साथ-साथ समाज सुधार व कुरीतियों को त्यागने का भी आह्वान किया जाता है।

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अरथूना-माही महोत्सव 7 से 9 जनवरी
07-01-2019 to 09-02-2019

कला-संस्कृति और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत के साथ नैसर्गिक सौंदर्यश्री को अपने आंचल में समाहित करने वाले बांसवाड़ा जिले को विश्व पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने के लिए आगामी 7 से 9 जनवरी, 2019 को अरथूना-माही महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। 

जनजाति क्षेत्रीय विकास, पर्यटन और वन विभाग के साथ-साथ गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय के सहयोग से आयोजित होने वाले इस तीन दिवसीय महोत्सव के ख्यातनाम शास्त्रीय और लोककलाकारों की प्रस्तुतियों के माध्यम से स्तरीय रंगारंग सांस्कृतिक आयोजन होंगे। 

राज्यमंत्री बामनिया 7 जनवरी को करेंगे रंगारंग शुरूआत: 
जिला कलक्टर गुप्ता ने बताया कि जिले की नैसर्गिंक संपदा, कला, संस्कृति के सौंदर्य को देश-दुनिया तक पहुंचाने की दृष्टि से पहली बार डिजीटल फोटो व विडियो प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है। यह प्रदर्शनी सूचना केन्द्र में 7 जनवरी को शुरू होगी। प्रदेश के जनजाति क्षेत्रीय विकास, उद्योग एवं राजकीय उपक्रम विभाग के राज्यमंत्री अर्जुनसिंह बामनिया के मुख्य आतिथ्य में इस प्रदर्शनी के शुभारंभ के साथ महोत्सव की शुरूआत होगी। प्रदर्शनी सुबह 11 बजे प्रारंभ होगी और इसमें जिले की नैसर्गिंक संपदा, प्राचीन शिल्पसौंदर्य और पर्यटन स्थलों के फोटो-विडियो को एलईडी टीवी के माध्यम से प्रदर्शित किया जाएगा। यह प्रदर्शनी तीन दिनों तक जनसामान्य के अवलोकन के लिए खुली रहेगी। 

कोणार्क फेस्टिवल की तर्ज पर होगा ‘अरथूना महोत्सव’: 
कलक्टर गुप्ता ने बताया कि महोत्सव के तहत 7 जनवरी की शाम दसवीं शताब्दी के पुरातात्विक महत्ता वाले जिले के सबसे महत्त्वपूर्ण और प्राचीन स्थल अरथूना में शास्त्रीय गीत-संगीत व नृत्यों की प्रस्तुतियां दी जाएगी। महोत्सव के दौरान अरथुना में रात्रि में कोणार्क फेस्टिवल की तर्ज पर प्राचीन मंदिरों पर विशेष रंगीन रोशनी की जाएगी तथा मंदिरों को आकर्षक तरीके से सजाया जाएगा। इन मंदिरों के आगे आकर्षक शास्त्रीय संगीत व नृत्यों की प्रस्तुतियां दी जाएंगी, देश के ख्यातनाम शास्त्रीय कलाकार इसमें प्रस्तुती देंगे |

जीजीटीयू करवाएगा बांसवाड़ा बर्डफेस्टिवल:   
8 जनवरी को कूपड़ा तालाब पर आयोजित होने वाले एक दिवसीय बांसवाड़ा बर्डफेस्टिवल के आयोजन की जिम्मेदारी गोविन्द गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय को दी गई है। बर्ड फेस्टिवल के आयोजन में देश-प्रदेश के बर्डवॉचर्स, बर्ड एक्सपर्ट्स के साथ शहर के समस्त निजी व सरकारी स्कूलों के लगभग 1 हजार विद्यार्थियों को बर्डवॉचिंग कराई जाएगी। इस मौके पर पूर्व की भांति क्विज एवं पेंटिंग प्रतियोगिता, फेस (टेटू) पेंटिंग, बर्ड्स की फोटो एवं स्टाम्प प्रदर्शनी के साथ तितलियों के जीवनचक्र की लाईव प्रदर्शनी का भी आयोजन किया जाएगा।  

कागदी पिक-अप-वियर का होगा प्रमोशन: 
 शहरवासियों को स्थानीय नैसर्गिक संपदा और संस्कृति से जोड़ने की दृष्टि से कागदी पिक-अप-वियर का प्रमोशन किया जा रहा है। इस बार फेस्टिवल के तहत 8 जनवरी की रात्रि इस आकर्षक उद्यान पर आकर्षक रोशनी की जाएगी तथा यहां पर मुक्ताकाशी रंगमंच स्थापित करते हुए लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां दी जाएंगी। 

ये आयोजन भी होंगे: 
 6 जनवरी को शहर में एक बाईक रैली का आयोजन किया जाएगा वहीं 9 जनवरी को गेमन पुल पर नौकायन प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा इसमें नौकाओं को आकर्षक ढंग से सजाया जाएगा और सर्वश्रेष्ठ नोकाचालक तथा रंगारंग नौका को पुरस्कृत भी किया जाएगा।  

भव्य सांस्कृतिक निशा से होगा समापन: 
कलक्टर ने बताया कि अरथूना-माही महोत्सव का समापन कुशलबाग मैदान में 9 जनवरी की रात्रि को भव्य सांस्कृतिक निशा के माध्यम से होगा। इसमें देश-प्रदेश के ख्यातनाम लोक कलाकारों के साथ वागड़ में होली के प्रतिनिधि गैर नृत्य की प्रस्तुतियां लोगों का मन मोह लेंगी। इस आयोजन में रंगीन रोशनी विशेष आकर्षण का केन्द्र रहेगी। 

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मौनी अमावस्या
04-02-2019

माघ मास की कृष्ण पक्ष पर पड़ने वाली अमावस्या मौनी अमावस्या कही जाती है। मौनी अमावस्या का हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व है। माघ माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहते हैं। इस दिन मौन रहना चाहिए।

शास्त्रों के अनुसार मुनि शब्द से ही ‘मौनी’ का उद्भव हुआ है। कहते हैं इस दिन मौन रहकर व्रत करने से सिद्धियों की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति इस दिन मौन व्रत करके समापन करता है उसे मुनि पद की प्राप्ति होती है। इस दिन तीर्थस्थलों पर स्नान करने से दिन की महत्ता कहीं बढ़ जाती है।

दान का भी इस तिथि पर विशेष महत्व है। कहा जाता है बिना स्वार्थ के जो व्यक्ति इस दिन दान करता है उस पर शिव और विष्णु दोनों की ही दयादृष्टि पड़ती है। कहा तो यह भी जाता है कि इस दिन मौन रहकर ही यमुना या गंगा में स्नान करना चाहिए। यदि यह अमावस्या सोमवार के दिन हो तो इसका महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है। माघ मास में अमावस्या पर स्नान करने से पापों से मुक्ति मिल जाती है। माघ मास की अमावस्या और पूर्णिमा दोनों ही तिथिया पवित्र होती हैं। इन दोनों पर्वों पर पृथ्वी के किसी न किसी भाग में सूर्य या चंद्रमा को ग्रहण लग सकता है। हम आपको इससे जुड़ी प्रचलित कथा के बारे में बताएंगे।

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वसंत पंचमी
10-02-2019

वसंत पंचमी या श्रीपंचमी एक हिन्दू त्योहार है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। यह पूजा पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। इस दिन स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती हैं।

प्राचीन भारत और नेपाल में पूरे साल को जिन छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था। जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों में सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं। वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती, यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है।

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