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दो मुहं सांपों की तरह नजर आते संतो के चेहरे

दो मुहं सांपों की तरह नजर आते संतो के चेहरे

दो मुहं सांपों की तरह नजर आते संतो के चेहरे Mouth looks like two snakes face of saints


कथित संत आसाराम के प्रकरण ने इस आस्थाओं वाले भारत देश के सामने ढेरों सवाल ला खड़े किए है। इस प्रकरण ने देश की जनता के सामने अहम सवाल तो यह खड़ा किया है की वो संतों या गुरू को चुनने का पैमाना किसे बनाए ? क्या गेरुआ या भगवा या फिर गले में कंठी माला पहनकर लोगों को राम-राम रटवाने वाले बाबा संत हो जायेंगे ? भारत के पुरातन इतिहास पर नजर दौड़ाई जाए तो यहां जो संत हुए है उन्होंने कभी संत होने का अहसास तक लोगों को नहीं होने दिया, ये तो उनके जाने के बाद लोगों ने अपनी आस्था को प्रकट करने के लिए उन्हें संत कहां। लेकिन आज के धोखेबाज शातिर चहरें जीते जी संत भी बन जाते है और मठाधीश के पद खरीदकर भोली-भाली जनता की आस्था से खेलते रहते है। लेकिन जब इन शातिरों के चेहरों से नकाब उतरते है तो कोई आसाराम तो कोई रामपाल का असली चेहरा प्रकट होता है। आज देश के हालात बड़े ही चिंता जनक होते जा रहे है, किसी वक्त भारत में संतों को बड़ा सम्मान दिया जाता था। जो आज भी बरकरार है, पर आज संत समाज या तो आस्था के नाम पर राजनीति करता है या फिर संतो की संगत राजनेताओं की तरह हो गई है, संतों के चेहरों से जिस तरह से नकाब उतर रहे है, उसे तो साफ जाहिर होता है की आने वाले वक्त में संत संस्कार देने की समाज को अलगाववादी के गुण देना शुरू कर देंगे। संतों पर जिस तरह से हाल ही में बलात्कार और योनशोषण जैसे संगीन आरोपों का लगना इस समाज की तस्वीर का बदलता हुआ रुप पेश कर रही है, कुछ दिनो पहले संत रामपाल को हिरासत में लेने के लिए हरियाणा पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। रामपाल के आश्रम में हजारों लोगों का होना और नाजायज हथियारों और रामपाल के समर्थकों द्वारा पुलिस पर पैट्रोल बंब से हमला करना, फायर करना समाज को किस दिशा में ले जाना चाहता है ? ये तो आने वाला समय ही बता पाएगा। समाज का संतो के प्रति आदर तो समझ में आता है पर इस तरह से अंधी भक्ति के चलते संत समर्थकों का कानून हाथ में लेना और समाज की व्यवस्थाओं बिगाड़ना कहां तक जायज है ? समाज और जनता के लिए भारत में न्यायपालिका है जिसके ऊपर आवाम को भरोसा करना होगा तभी शायद इस गंभीर मुद्दों पर एक प्रतीकात्मक नजरिया सामने आएगा। और जहां समाज की बात है तो बिलकुल भी कहां नहीं जा सकता की कोन संत समाज बनाना चाहता है और कोन जनता को बेवकूफ बनाकर अपनी दुकान चलाना चाहता है? आज देश में जिस तरह से संतों के चेहरे दो मुहं सांपों की तरह सामने आ रहे हैं। एक चेहरा समाज बनाने की बात करता है और दूसरा नक्सलवाद। अभी जिस तरह से आसाराम, नारायण साई और रामपाल जैसे संत जनता को ढाल बना रहें है उससे तो यह साफ हैं कि देश फिर से गुलामी की और बढ़ रहा है। संतो समाज कल्याण के लिए होता है ना की समाज के विनाश के लिए भारत देश में अनादिकाल से संतो पर विश्वास किया जा रहा है और संत ही देश के आचरण और संस्कृति को जिंदा रखने में अपना योगदान देते है पर हालही में जिस तरह से संतो के घिनौने चेहरे सामने आए है उससे तो यह तय करना बड़ा ही मुश्किल है की ये देश को किस दिशा में ले-जाना चाहते है।

 

।।विवेक वीरेंद्र उपाध्याय।।

Sub-Editor, Daineek Bhasker, Banswara

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